Wednesday, February 1, 2017

पंछी बनकर उड़ने की चाह

बात सन् 1993-94 की है, हम लोग 9th में पढ़ते थे। पिथौरागढ़ में हमारे स्कूल की तरफ पहली बार पैराग्लाइडिंग का प्रशिक्षण शुरू हुआ। रंगीन छतरियों की उड़ने की कोशिश को नजदीक से देखने की चाहत में हम बहुत बार स्कूल से भागकर उस पहाड़ पर चढ़ जाते थे जहाँ Paragliding चल रही होती थी। उस समय उड़ान भरने की तो हमारी उम्र थी नहीं, लेकिन ये तो ठान ही लिया था कि किसी दिन अपने गांव-शहर का Bird's Eye View जरूर देखना है।

लगभग उसी दौरान पिथौरागढ़ में हवाई पट्टी का उदघाटन हुआ तो शहर के लोगों के सपनों को पंख लग गए। ऐसा कहा जाने लगा कि अब जल्द ही पिथौरागढ़ विश्वभर के पर्यटन मानचित्र पर छा जाएगा। ऐसा हो भी सकता था क्योंकि यहां के अनछुए पर्यटक स्थलों में विश्वभर के पर्यटकों को आकर्षित करने की पूरी सम्भावनाएं छुपी हुई हैं। लेकिन अफ़सोस की बात है कि एअरपोर्ट की कहानी आज 23 साल बाद भी 'घोंघे की रफ्तार' से आगे बढ़ रही है। खैर...



वापस पैराग्लाइडिंग पर लौटते हैं.. पहले पढ़ाई और बाद में नौकरी की उलझनों में फंसकर बहुत लम्बा समय निकल गया। पिथौरागढ़ में पैराग्लाइडिंग करने की इच्छा मन में बनी रही पर संयोग बन नहीं पा रहा था। इस बार की छुट्टियों में शंकर सिंह जी के मार्गनिर्देशन में पिथौरागढ़ के आसमान में  पैराग्लाइडिंग करने का मौका मिला तो इस अनुभव की अमिट यादें दिल के कोने में दर्ज हो गईं।

30 जनवरी'17 को मौसम साफ़ था, हल्की धूप थी और बादल बिल्कुल भी नहीं थे। हवा की तीव्रता थोड़ा कम थी। कुल मिलाकर पैराग्लाइडिंग के लिए ठीकठाक मौसम था। मुझे एडवोकेट मनोज ओली जी के साथ 'टेंडम फ्लाइट' में उड़ना था और हमारा साथ देने के लिए शंकर दा ने 'सोलो फ्लाइट' की। एअरपोर्ट के ठीक ऊपर समुद्रतल से लगभग 1900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कनारी-पाभैं की चोटी पर पहुँचकर एक अलग ही अनुभूति हुई। यहां से पिथौरागढ़ की 'सोरघाटी' का पूरा नजारा एक ही नजर में दिख जाता है। इतनी ऊँची जगह से मैंने भी पहली बार अपने शहर को देखा था। और अब इससे भी ऊपर उड़ने को मैं उत्साहित था। देश, राज्य और पिथौरागढ़ जिले में साहसिक खेलों को आगे बढ़ाने वाले दो महत्वपूर्ण लोग आज मेरे साथ थे। मैं शंकर दा और मनोज जी से बातचीत करते हुए उनके अनुभवों से बहुत कुछ सीखता-समझता जा रहा था। दोनों पैराग्लाइडर बैग से निकल चुके थे और हम लोग कैमरा और बांकी उपकरणों के साथ पूरी तरह से तैयार हो गए। हवा की अनुकूल दिशा के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ा। मनोज ओली जी के निर्देश मिलते ही ढलान की तरफ लगभग 10 कदम की दौड़ लगाने पर ग्लाइडर हवा में उठ गया। अपने रोमांच को नियंत्रित करने में मुझे 5-7 सेंकड लगे और उसके बाद मैं अपने सपने को पूरा होते देखने का आनन्द उठाने लगा।



वाह! अदभुद अनुभव,, हमारे बाएँ हाथ की तरफ नेपाल के पहाड़, सलेटी का मैदान और वड्डा था। सामने मेरे गाँव का ऊपरी कोना, कामाक्ष्या मन्दिर और सेंट्रल स्कूल। दाएं हाथ की तरफ हवाईपट्टी, पिथौरागढ़ का मुख्य शहर और पैरों के नीचे कनारी-पाभैं, नैनीसैनी गाँव थे। ऊपर से दिखने वाली जानी पहचानी पहाड़ों की चोटियां, गहरी खाइयां, जंगल, खेल के मैदान, नदियां,,, इन सबसे मेरा बचपन से ही भावनात्मक जुड़ाव रहा है। मैं सोचने लगा हमारे आसपास उड़ रहे चील उड़ते हुए कितना सुंदर नजारा देखते हैं।

लगभग 10 मिनट हवा में रहने के बाद बहुत ही सुरक्षित लैंडिंग हुई। इस यादगार हवाई यात्रा के बाद जब हम हवाईपट्टी के पास बने हुए अपने लैंडिंग पॉइंट पर उतरे तो मेरे दिल में सन्तुष्टि का भाव था। थोड़ी देर बाद शंकर दा का पैराग्लाइडर भी नीचे उतरा।



शंकर सिंह जी और मनोज ओली जी से हुई लम्बी बातचीत और इस पैराग्लाइडिंग अनुभव के बाद मैंने  महसूस किया कि उत्तराखंड राज्य में (खासकर पिथौरागढ़ जिले में) रॉक क्लाइम्बिंग, फिशिंग, हाईकिंग, माउंटेनियरिंग, माउंटेन बाइकिंग, वाटर स्पोर्ट्स जैसे साहसिक खेलों को बढ़ावा दिया जाए तो हम स्विट्ज़रलैंड को भी पीछे छोड़ सकते हैं। हमारे पास कमी है तो सिर्फ सुगम आवागमन सुविधाओं की और ठोस सरकारी नीतियों की।

पैराग्लाइडिंग के इस अनुभव के साथ एक और चीज हमेशा याद रहेगी,,, उड़ने से पहले और बाद में सड़क के किनारे बैठकर गुड़ की 'कटकी' के साथ अदरक वाली जायकेदार चाय की चुस्कियां।

शुक्रिया शंकर सिंह जी (मो. 8979227575 ), एडवोकेट मनोज ओली जी (मो. 9412374199)
टेक ऑफ से लैंडिंग तक का पूरा वीडियो,, http://www.youtube.com/watch?v=l3WrVDlANCA

Tuesday, October 20, 2015

कुमाऊंनी रामलीला : कला-संगीत के साथ सदभावना का रंगमंच


हमारे बचपन के दिनों में आज की तरह मनोरंजन के बहुत ज्यादा साधन नहीं थे। पिथौरागढ शहर और आसपास के गांवों में रामलीला की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जाती थी। बढती जा रही ठण्ड की रात कस्बों में रामलीला शुरु होने से पहले ही लोग अपनी जगह पर आकर बैठ जाते थे। घरों से स्टूल, दरी और बुजुर्ग लोग कम्बल लपेट कर जगह घेर लेते थे। युवाओं-किशोरों के मन में रात के मेले में स्वच्छन्द घूमने का आकर्षण होता था तो बुजुर्गों के मन में रामकथा के पूज्य पात्रों के प्रति अगाध श्रद्धा। 

पुराने समय की कुमाऊंनी रामलीला में भाग लेने की प्रथम योग्यता होती थी ऊंचा स्वर, सुरों पर अच्छी पकड़ और मधुर आवाज। उत्तराखण्ड खासकर कुमाऊं अंचल में होने वाली पूरी रामलीला मुख्यतया गीत-नाट्य शैली में प्रस्तुत की जाती है जो पीलू, बसंत बहार, विहाग, पुर्विया, धनाश्रीजैसे कठिन रागों पर आधारित है। रामलीला के गेय संवादो में प्रयुक्त गीतों में दादरा, कहरुवा, चांचर व रुपक ताल का प्रयोग होता है। कलाकारों के साथ-साथ साल-दर-साल रामलीला देखते आ रहे दर्शकों को भी एक एक संवाद याद होता है। हारमोनियम और तबला मुख्य वाद्य यन्त्र होते हैं और हर पात्र अपने संवाद गायन शैली में दर्शकों तक पहुंचाता है। भावों और संवादों की तीव्रता में पारसी थिएटर की छाप दिखाई देती है। रामलीला मुख्यत: पुरुष ही महिला पात्रों का अभिनय करते हैं लेकिन अब कुछ जगहों पर महिलाएं भी कास्ट्यूम, मेकअप और पार्श्व गायन में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं।

रामलीला के कुछ मुख्य प्रसंग हैं जैसे - सीता स्वयंवर,परशुराम-लक्ष्मण संवाद, दशरथ-कैकयी संवाद, सुमन्त का राम से आग्रह, सीताहरण, लक्ष्मण शक्ति, अंगद-रावण संवाद, मन्दोदरी-रावण संवाद व राम-रावण युद्ध हैं, जिन्हें देखनेके लिये जनता  खासतौर पर उत्सुक रहती है।

यह माना जाता है कि कुमायूं में पहली रामलीला 1860 में अल्मोड़ा नगर में हुई। बाद में नैनीताल, बागेश्वर व पिथौरागढ़ में कुछ सालों के अन्तराल में रामलीला नाटकों का मंचन प्रारम्भ हुआ। कई शहरों में भी रामलीला का मंचन 100 साल से भी अधिक समय से हो रहा है। शास्त्रीय संगीत जटिल पक्षों का ज्ञान न होते हुए भी लोग सुनकर ही इन पर आधारित गीतों को सहजता से याद कर लेते थे।

अल्मोड़ा नगर में 1940-41 में विख्यात नृत्य सम्राट पं० उदय शंकर ने छाया चित्रों के माध्यम से रामलीला में नवीनता लाने का प्रयास किया था। उनके द्वारा किये गये छायाभिनय, उत्कृष्ट संगीत व नृत्य की अमिट छाप कुमाऊं की रामलीला पर भी पड़ी।समय के साथ रामलीला मंचन में भी तकनीक का प्रयोग किया जाने लगा है। विशेष प्रभाव देने के लिये आतिशबाजी, रस्सी के सहारे हवा में उड़ना, प्रोजेक्टर आदि से दृश्य निर्माण के सफ़ल प्रयोग हुए हैं।

आज से 25-30 साल पहले जाड़ों की तीव्रता बढने के साथ ही “रामलीला की तालीम” शुरु होने की खबरें सुनाई देती थीं। किशोरावस्था में पहुंचे तो तालीम शब्द को भी कुमाऊंनी भाषा का शब्द समझा, ये तो बाद में पता चला कि तालीम उर्दू भाषा का शब्द है। एक पौराणिक कथा के मंचन की तैयारियों को “अभ्यास” की जगह “तालीम” कब से कहां जाने लगा होगा? ये सवाल दिमाग में घूमता रहता था...


दरअसल हमारा मुस्लिम समाज कुमाऊं के हर कस्बे-शहर में होने वाली रामलीला मंचन का एक अभिन्न अंग है.. संगीत, मेकअप, मंच सज्जा, मुखौटा निर्माण से लेकर मंच पर अभिनय में भी मुस्लिम समाज के सदस्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आये हैं।अभी भी पहाड़ का सामाजिक ताने-बाने में मुस्लिम समाज के लोगों को बहुत सम्मान दिया जाता है। दशहरा और रामलीला तो ऐसे त्यौहार हैं जहां हिन्दू-मुस्लिम के बीच अन्तर समाप्त हो जाता है। दशहरा और रामलीला रचनात्मकता के पर्व हैं। हुनरमन्द की जाति या धर्म नहीं देखा जाता। संगीत और कला हमारे समाज में स्पन्दन पैदा करते हैं और कलाकार दिलों को जोड़ने का काम करते हैं।

 

टीवी और मनोरंजन के अन्य माध्यमों के आने के बाद रामलीला के प्रति अब आम जनता में पुराने दिनों जैसी उत्सुकता नहीं रहती लेकिन अभी भी रामलीला का मंचन पहाड़ के लगभग हर शहर और कस्बे में पूरी तैयारी के साथ होता है। इसके अलावा प्रवासी लोग देश के कई शहरों में पारम्परिक रामलीला का कुमाऊंनी भाषा में मंचन करते हैं। अभिनय और संगीत में रुचि रखने वाले नवोदित कलाकारों को मंच देने वाली इस विधा को जीवित रखा जाना चाहिये।

रामलीला और दशहरा, इन त्यौहारों का सिर्फ़ धार्मिक महत्व नहीं है, इन आयोजनों के साथ एक महत्वपूर्ण सामाजिक सन्देश भी जुड़ा हुआ है। इस समय जब धार्मिक और जातीय कट्टरता हमारी नई पीढी के मन में कटुता पैदा कर रही है, तब समाज के विभिन्न वर्गों के सामूहिक प्रयास से होने वाले रामलीला जैसे आयोजन समाज को सहिष्णु और सौहार्द भाव से मिलजुल कर रहने का सन्देश भी देते हैं।

Monday, November 1, 2010

पहाड़ की ज्वलन्त समस्याओं को सामने रखने में सफल रही “दायें या बायें”

उत्तराखण्ड के ग्रामीण परिवेश पर आधारित बेला नेगी निर्देशित बहुप्रतिक्षित फिल्म “दायें या बायें” 29 अक्टूबर 2010 को देश के कुछ चुनिन्दा शहरों के साथ ही नैनीताल फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन प्रदर्शित की गयी. इस फिल्म की लेखिका और निर्देशिका बेला नेगी मूलत: नैनीताल की ही निवासी हैं. इस फिल्म का नैनीताल में प्रदर्शन इसलिये भी खास रहा क्योंकि नैनीताल के ही स्थानीय कलाकारों ने इस फिल्म में कई महत्वपूर्ण रोल निभाये हैं. सभी स्थानीय कलाकार भी फिल्म के विशेष प्रदर्शन के मौके पर उपस्थित थे, सिर्फ गिरीश तिवारी “गिर्दा” को छोड़कर, जिनका अगस्त में देहान्त हो गया था.



फिल्म के स्थानीय कलाकार नैनीताल फिल्म फेस्टिवल के दौरान

“दायें या बायें” एक स्वस्थ मनोरंजक फिल्म होने के साथ-साथ पहाड़ की कई जटिल समस्याओं की ओर भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल रही है. फिल्म के माध्यम से बेला नेगी ने कामेडी के बेहतरीन मिश्रण के साथ पहाड़ों में महिलाओं की स्थिति, शराबखोरी, दिशाहीन युवा पीढी, प्राकृतिक सम्पदाओं के अनियन्त्रित दोहन, राजनेताओं की कुटिल चालों के साथ-साथ पिछड़े इलाकों में शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा को भी बखूबी दर्शाया है. यहां तक की जहरखुरानी और जंगल की आग की तरफ भी ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की गई है. पर्वतीय ग्रामीण अंचल की पृष्टभूमि पर बनी शायद यह पहली फिल्म है जिसे इतने बड़े पैमाने पर बनाया गया है. पूरी फिल्म में पहाड़ के लोकजीवन एवं समस्याओं को बेहतरीन ढंग से दर्शाया गया है. बेला नेगी ने एक दृश्य में जागर का समावेश करके पहाड के लोक संगीत को भी फिल्म में स्थान देने की कोशिश की है.

पूरी फिल्म में काम करने वाले 1-2 कलाकारों को यदि छोड दिया जाये तो बांकी लोगों ने पहली बार फिल्म में अभिनय किया है. यहां तक की बेला ने ग्रामीण लोगों के रोल में गांव के वास्तविक निवासियों से अभिनय करवाया है. इससे पूरी फिल्म हकीकत के बहुत करीब लगने लगती है. पहाड़ पर आधारित फिल्म बनाने की बेला की यह ईमानदार कोशिश भावनात्मक तौर पर तो बेहद सफल रही है. देश भर के जाने-माने फिल्म समीक्षक भी इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैं लेकिन आर्थिक आधारपरयह फिल्म कितनी सफल होगी यह देखना दिलचस्प होगा.

Monday, October 4, 2010

उत्तराखण्ड आपदा – इन घावों को भरने में बहुत समय लगेगा

All Photos By- Kalyan Mankoti
हर साल की तरह इस साल भी उत्तराखण्ड के पर्वतीय और मैदानी इलाकों में भारी बारिश के कारण जान-माल का भारी नुकसान हुआ. 18 अगस्त को सुमगढ, जिला बागेश्वर में 18 बच्चों की स्कूल बिल्डिंग में दबने से हुई मौत की खबर ने पूरे राज्य को भारी सदमा पहुंचा, इससे उबरने से पहले ही ठीक एक महीने बाद 18 सितम्बर को अल्मोड़ा जिला मुख्यालय और उसके आसपास के इलाकों के साथ ही नैनीताल जिले के कुछ हिस्सों में बारिश भारी तबाही लेकर आयी. पिथौरागढ में मुनस्यारी तहसील का पूरा क्वीरीजीमिया गांव भूस्खलन के बाद खाली करना पड़ा. गढवाल मण्डल में हालांकि मानव जीवन का नुकसान अपेक्षाकृत कम हुआ लेकिन सम्पत्तियों का नुकसान भारी मात्रा में हुआ. इस बार की आपदा एक जगह पर केन्द्रित न होकर बड़े-छोटे रूप में सब जगह फैली हुई दिख रही है. भारी बारिश से सड़क परिवहन ऐसा ध्वस्त हुआ कि मुख्य सड़कों को खुलने में भी 2-3 महीने का समय लगने का अनुमान है.

अपने समाज में दुखी व्यक्ति की मदद करना और परिचित की खुशी को अपनी खुशी समझना हमारी मूल संस्कृति रही है. इस दैवीय आपदा के समय भी आपदा प्रभावितों की सहायता के लिये हर तरफ से हाथ उठ रहे हैं. लेकिन आपदा प्रभावितों को मुआवजा देने की सरकार की नीति पर कई सवाल उठाये जा रहे हैं. सरकार द्वारा अनुमोदित धनराशि आपदा प्रभावितों को राहत पहुंचाने के लिये नाकाफी साबित हो रही है. सरकार द्वारा चलायी जा रही आपदा राहत का एक दुखद पहलू यह है कि सरकार उन्हीं लोगों की सहायता के प्रति अधिक गम्भीर है जिनके परिवार में मानव जीवन की क्षति हुई है. अधिकांश परिवार ऐसे हैं जिनके घरों को दिन में नुकसान हुआ, जिससे इनकी और परिवार की जान तो बच गयी लेकिन घर, मवेशी, अनाज, बर्तन, कपड़े और अन्य सम्पत्ति पूर्ण रूप से मलवे में दब गयी या क्षतिग्रस्त हो गयी. ऐसे परिवारों के प्रति सरकार संवेदनशील नजर नहीं आ रही है.

पिछले सप्ताहान्त में अल्मोड़ा और उसके आसपास आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में जाकर देखने पर यह बात समझ में आयी कि सरकार ने लगभग 2 हफ्ते बाद भी ऐसे परिवारों को नजरअन्दाज किया हुआ है. क्षतिग्रस्त घर के अन्दर सभी आवश्यक सामग्री दब चुकी है और दुधारू जानवर भी खत्म हो गये हैं. अल्मोड़ा से 40 किमी दूर जूड़-कफून गांव के शेर राम ने बताया कि आपदा आने के बाद उन्हें तीन दिन तक खाना नसीब नहीं हुआ. शेर राम की बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे राज्य का आपदा प्रबन्धन कितना चुस्त-दुरुस्त है. गांवों के साथ-साथ कस्बों की स्थिति भी खराब है. अल्मोड़ा शहर के कई मोहल्ले भूस्खलन की चपेट में आये हैं. डिग्री कालेज के पास इन्दिरा कालोनी के कई घर अब रहने लायक नहीं रह गये हैं.

इस समय जब प्रशासन के आला अफसरों को आपदा पीड़ितों को राहत पहुंचाने में जुटना चाहिये, वो विशिष्ट लोगों के दौरों की व्यवस्था करने में जुटे हुए हैं. पहाड़ को भुला चुके पहाड़ी मूल के कई नेता भी इस बार आपदा प्रभावितों से मिलने पहुंच रहे हैं, लेकिन इनके दौरों से विपदाग्रस्त लोगों की समस्याओं का स्थायी समाधान होगा या ये दौरे सिर्फ खानापूर्ति में सिमट जायेंगे, यह भविष्य में देखा जायेगा.




आपदा के आधे महीने बाद भी पुनर्वास और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने की योजनाओं के बारे में काम शुरू नहीं हो पाया है. अब जब बारिश का कहर थम चुका है और सरकार को केन्द्र से आपदा राहत के लिये धन भी आबन्टित हो चुका है, इस समय भी पहाड़ में कुछ ऐसे लोग सरकार की नजरों में आने से बच गये हैं, जिनका सर्वस्व प्रकृति के इस कोप ने खाक कर दिया है. उत्तराखण्ड के सभी लोगों के मन में यह आशंका है कि केन्द्र से मिली धनराशि का सदुपयोग हो भी पायेगा या नहीं. अल्मोड़ा के लोगों का मानना है कि सरकार बारिश खत्म होने के कुछ समय बाद इस विपदा को भी वैसे ही भूल जायेगी जैसे वो गरमी खत्म होते ही पेयजल की समस्या को भूल जाती है.

आपदा प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने के बाद हमें यह महसूस हो रहा है कि इन आपदा प्रभावित लोगों की सहायता के लिये उत्तराखण्ड के सभी प्रवासियों और निवासियों को आगे आना चाहिये और उन्हें इस बात का अहसास कराना चाहिये कि सभी लोग उनके साथ है. सरकार की दिशा और नीति देखकर तो यही लग रहा है कि उत्तराखण्ड और आपदाओं का साथ बहुत लम्बा रहेगा. भगवान न करे अगला नम्बर हमारा या किसी परिचित का होगा तो तब ये ही लोग हमारी मदद करेंगे, जिनकी मदद हम अभी कर रहे हैं. सरकार और अफसर तो शायद तब भी विशिष्ट लोगों के दौरों को सुगम बनाने में व्यस्त होंगे.


प्रवासी युवाओं की संस्था "क्रिएटिव उत्तराखण्ड - म्यर पहाड़" भी उत्तराखण्ड के आपदा प्रभावितों को राहत सामग्री पहुंचाने का प्रयास कर रहा है. ज्यादा जानकारी के लिए यहां जाएं.

Thursday, September 30, 2010

कामरेड पी. सी. जोशी – भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के शिल्पी


उत्तराखण्ड में समय-समय पर कई ऐसे व्यक्तित्व पैदा हुए हैं जिन्होंने राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. अल्मोड़ा के श्री पूरन चन्द्र जोशी जिन्हें भारतीय इतिहास में पी सी जोशी के नाम से जाना जाता है, एक प्रखर स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, विचारक, लेखक, पत्रकार, संगठनकर्ता और राजनेता थे. पी सी जोशी का जन्म 14 अप्रैल 1907 को अल्मोड़ा में पण्डित हर नन्दन जोशी जी के घर पर हुआ. उनकी माता का नाम श्रीमती मालती देवी था. अल्पावस्था में ही जोशी गांधीजी के स्वराज आन्दोलन से प्रभावित होकर कांग्रेस पार्टी की राजनैतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे. उन्होंने हापुड़ के राजकीय विद्यालय से 1920 में मैट्रिक की परीक्षा पास की.



पूरन ने 1922 में अल्मोड़ा के राजकीय इन्टर कालेज से इन्टरमीडियेट की परीक्षा पास की . संस्कृत विषय में उन्हें विशेष योग्यता के लिये स्वर्ण पदक प्रदान किया गया था. आगे की पढाई के लिये उन्हें इलाहाबाद भेजा गया जहां उन्होंने अंग्रेजी, इतिहास और अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक किया और1928 में एम. ए. करने के बाद अगले साल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही एल.एल.बी. भी पूरी की.

इलाहाबाद में पढाई के दौरान पूरन मोतीलाल नेहरू और मदन मोहन मालवीय जैसे अग्रणी नेताओं के सम्पर्क में आये और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में ‘इलाहाबाद यूथ लीग’ नामक संगठन में शामिल हो गये. 1927 में जोशी को ब्रुसेल्स और सोवियत संघ के दौरे करने का मौका मिला जहां उन्हें आन्दोलनों में किसानों और मजदूरों के योगदान को देखने समझने का मौका मिला. 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के बाद कांग्रेस की अस्पष्ट नीतियों से खिन्न होकर उनका झुकाव कम्युनिस्ट विचार धारा की तरफ होने लगा. 1928 में ही पीसी जोशी Peasants’and Workers’Party की उत्तर प्रदेश शाखा के संयुक्त सचिव नियुक्त हुए. 1929 में मजदूरों की देशव्यापी हड़ताल को असफल बनाने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने कामगार संगठनों के नेताओं को गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया. पीसी जोशी को भी 20 मार्च 1929 को इलाहाबाद के हालैण्ड हास्टल से गिरफ्तार कर लिया गया. सभी वरिष्ट नेताओं के बीच 22 साल के पीसी जोशी सबसे कम आयु के थे. 31 मजदूर नेताओं पर मेरठ में एतिहासिक मुकदमा चलाया गया. मजदूरों के हक-हकूकों की मांग को सभी नेताओं ने तार्किक तरीके से अदालत के सामने रखा, तत्कालीन समाचार पत्रों ने इस मुकदमे को भरपूर कवरेज दी जिससे पूंजीवादी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नेताओं की दलीलें आम जनता तक पहुंचने लगी. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने भी मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक आठ सदस्यीय “डिफेन्स कमिटी” बनाकर इन मजदूर नेताओं को कानूनी मदद दी थी. महात्मा गांधी ने भी जेल में जाकर इन मजदूर नेताओं से मुलाकात की. इस तरह मेरठ काण्ड के बहाने विभिन्न विचारधाराओं के राष्ट्रीय नेताओं को एकजुट होने का मौका मिला. मेरठ के एडिशनल जज के सामने पी.सी. जोशी ने निम्न बयान दिया-

“My name is Puran Chand Joshi; my father’s name is Pandit Har Nandan Joshi. I am by caste – No cast. 24 years of age, by profession student; my hometown is at Almora, Police Station, Almora district, Almora; I reside at Almora.”

जोशी और उनके साथियों ने मेरठ मुकदमे में अपनी दलीलों के माध्यम से औपनिवेशिक सरकार की साम्राज्यवादी सोच की सच्चाई को उजागर किया. इस मुकदमे के बाद जोशी एक बेहतरीन लेखक के रूप में उभर कर सामने आये. राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की नजर में आने के बाद स्पष्ट सोच और अद्वितीय संगठन क्षमता के बल पर 28 साल की अवस्था में जोशी को आल इण्डिया कम्युनिस्ट पार्टी का अखिल भारतीय संगठन खड़ा करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने का मौका मिला. जून1937 में पीसी जोशी को CPI का जनरल सेक्रेटरी चुना गया , वो इस पद पर 1948 तक बने रहे. पी.सी. जोशी के कुशल नेतृत्व में पार्टी ने अभूतपूर्व उपलब्धियां प्राप्त की. जोशी के कार्यकाल में देश के विख्यात संस्कृतिकर्मी, लेखक, शायर, लोक कलाकार, पत्रकार और बुद्धिजीवी CPI में शामिल हुए. जोशी ने देश के विभिन्न हिस्सों से विशुद्ध लोक कलाकारों को ससम्मान पार्टी की मुख्यधारा में शामिल किया. लोक संस्कृतियों में छिपे एकजुटता और सामाजिक सौहार्द के मूल तत्व को समझ कर उन्होंने इसे मंच पर प्रदर्शित करने के लिये लोककलाकारों को प्रोत्साहित किया. ईप्टा “Indian Peoples Theatre Association”जैसे महत्वपूर्ण जनवादी रंगमंच समूह को तैयार करने में जोशी का विशेष योगदान था. जोशी की कुशल संगठनक्षमता और मार्गदर्शन के फलस्वरूप Progressive Writer’s Association (PWA) से कई लेखक जुड़े, जिन्होंने पूरे समाज को एक नयी दिशा दी. पी.सी. जोशी अलग-अलग धड़ों में काम कर रहे कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों को एकजुट करने में सफल रहे. उनके द्वारा सम्पादित National Front नामक समाचार पत्र कामगारों, किसानों , युवा छात्रों और स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के लिये एक प्रमुख पत्र बनकर उभरा.

1942 के बाद “भारतछोडो आन्दोलन”में शामिल न होने के कारण कम्यूनिस्ट पार्टियों को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा था, इस समय जोशी अपने दल के लोगों को के साथ “बंगाल के अकाल”से जूझ रहे लोगों की सेवा में जी-जान से जुट गये. बंगाल में भुखमरी के कारण सड़कों पर लाखों लोग तड़पते हुए दम तोड़ रहे थे. दुर्भिक्ष के कारण हजारों औरतें अपनी देह बेचने को मजबूर होने लगीं तो जोशी के सहयोग से महिलाओं का एक सशक्त संगठन खड़ा हुआ, जिसका नाम था महिला आत्म रक्षा समिति (MARS). कामरेड पी.सी. जोशी की प्रेरणा से कम्युनिस्ट दलों ने “भूखा है बंगाल”नाम से एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया. उन्होंने स्वयं 6 हफ़्तों तक बंगाल में सर्वाधिक अकालग्रस्त इलाकों में रहकर राहत शिविर संचालित किये. जोशी जी द्वारा बंगाल दुर्भिक्ष पर एक पर्चा निकाला, जिसका शीर्षक था- Who Lives if Bengal Dies? इस पर्चे के द्वारा उन्होंने जमाखोरों औरपूंजीपतियों को लताड़ा और संकट की इस घड़ी में देश भर के हिन्दू-मुस्लिम भाइयों से एकजुट होने की अपील की. जोशी के अथक प्रयासों के फलस्वरूप बंगाल का अकाल एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में सामने आया , जोशी ने अन्य दलों के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को भी अपनी इस मुहिम में शामिल किया. बंगाल के लोगों का दुख-दर्द देशवासियों के सामने रखने के लिये और आर्थिक मदद जुटाने के लिये कामरेड जोशी ने उस समय के प्रतिष्टित रंगमंच कलाकारों को एकजुट किया और “अन्तिम अभिलाषा” नाम का एक प्रसिद्ध नाटक तैयार किया गया. इस नाटक के माध्यम से बंगाल के लोगों की पीड़ा को देखने के बाद देश भर के लोगों ने दिल खोल कर दान दिया. इस पैसे से कम्युनिस्ट पार्टी ने बंगाल में 700 सामूहिक रसोइयां संचालित कीं, जिनमें प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोग भोजन करते थे. दाने-दाने को तड़प रहे बंगाल के गरीब लोगों के लिये इससे बड़ी राहत और क्या हो सकती थी!

जल्दी ही कामरेड पी.सी. जोशी पूरे देश के कम्युनिस्ट आन्दोलन के अग्रणी और लोकप्रिय नेता बन गये. देशभर में जहां भी किसानों, कामगारों, छात्रों औरमहिलाओं के संघर्ष उपजे कामरेड जोशी उसे समर्थन और ऊर्जा देने के लिये वहां उपस्थित थे. एक तरफ उनके कुशल मार्गदर्शन में ईप्टा “Indian Peoples Theatre Association” देशभर की लोककलाओं को मंच पर लाकर एक प्रकार से सांस्कृतिक क्रान्ति फैलाने का काम कर रही थी, वहीं National Front, People’s War और People’s Age जैसे मुखपत्र देशभर के लोगों को राष्ट्रवाद और कम्युनिज्म के विचारों से जोड़ रही थीं. जोशी ने पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने के लिये पूरे भारत की यात्रा की औरसमाज के अन्तिम व्यक्ति के साथ बैठकर उसकी जीवन-शैली, दिनचर्या व कठिनाइयों को आत्मसात किया. आजादी के संघर्ष के दौरान ही कामरेड पी.सी. जोशी मुस्लिम लीग की देश विघटन की मंशा भांप चुके थे. जोशी ने उसी दौर में सभी प्रमुख नेताओं के सामने एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार का प्रस्ताव रखा जिसमें हिन्दू महासभा -मुस्लिम लीग मुख्य घटक हों और कांग्रेस व-कम्युनिस्ट पार्टी उसे बाहर से समर्थन दें. यदि जोशी के इस सुझाव पर गम्भीरता से विचार किया जाता तो शायद देश विभाजन से बच जाता. 1947 में जैसे ही भारत स्वतन्त्र हुआ, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के अग्रणी नेताओं के बीच गम्भीर मतभेद पैदा हो गये. कामरेड पी. सी. जोशी ने भारत की स्वतन्त्रता का स्वागत किया लेकिन पार्टी के अन्य वरिष्ट नेताओं ने देश की आजादी को “झूठी आजादी” माना और कुछ विदेशी कम्युनिस्टों के सुझावों के अनुसार जोशी को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. जोशी पर यह भी आरोप लगाया गया कि वो कांग्रेस के वरिष्टतम नेताओं के करीबी हैं इसलिये भारत में सशस्त्र क्रान्ति को अपना समर्थन नहीं दे रहे हैं. जोशी ने आजादी के बाद देश में भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप कम्युनिज्म की नयी विचारधारा विकसित करने की भरसक कोशिश की लेकिन पोलित ब्यूरो के अन्य सदस्य सोवियत संघ और चीन के कम्युनिस्ट नेताओं के प्रभाव में आ चुके थे और जोशी उसी पार्टी में अकेले पड़ते गये जिसकी सदस्यता उनके ही प्रयासों से अप्रत्याशित तरीके से 50 से 90,000 तकपहुंची थी. लेकिन कई उतार चढावों के बावजूद जोशी आजन्म अपनी पार्टी के प्रति समर्पित रहे. उन्होंने कभी भी अलग पार्टी या पार्टी के अन्दर अलग गुट बनाने की कोशिश नहीं की. लेकिन जोशी के जाने से CPI को मिलने वाले जनसमर्थन में भारी कमी आई और पार्टी की सदस्यता दो सालों में ही आश्चर्यजनक रूप से 90,000 से 9,000 पर आ पहुंची. बाद के वर्षों में कई वरिष्ट कम्युनिस्ट नेताओं ने भी इस बात को स्वीकार किया कि जोशी ने भारत की स्वतन्त्रता का जो आंकलन किया था पार्टी को उस पर गम्भीरता से मंथनकरना चाहिये था. जोशी को 1951 में पुन: पार्टी में वापस ले लिया गया लेकिन उसके बाद जोशी स्वयं पार्टी के शक्ति केन्द्र से दूर बने रहे. जोशी ने बंगाल की मशहूर विख्यात नेत्री कल्पना दत्त से शादी की.

राष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखण्ड राज्य की मांग को उठाने वाले लोगों में कामरेड पी. सी. जोशी भी थे. उनका मानना था कि विशिष्ट भौगोलिक परिस्थिति औरअलग संस्कृति के लोगों के लिये पृथक राज्य होना ही चाहिये. राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े व्यक्तित्व में उभर चुके कामरेड जोशी को पहाड़ों से बड़ा लगा व था. वो समय-समय पर अल्मोड़ा आते थे और जिले के गांवों की पैदल यात्रा करते थे. ऐसी ही एक पैदल यात्रा के दौरान 1955 में एक शाम पी.सी. जोशी अल्मोड़ा के नौगांव में कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बिष्ट के घर पर रुके उनके दल में मोहन उप्रेती भी थे जो अल्मोड़ा शहर में रहते थे और उत्तराखण्ड की लोककलाओं के बारे में अनभिज्ञ थे. उस शाम रीठागाड़ के लोककलाकार मोहन सिंह बोरा (मोहन सिंह रीठागाड़ी) ने इन लोगों को कुमाऊं की पारम्परिक लोककथाएं और लोक गीतों से मन्त्रमुग्ध कर दिया. मोहन उप्रेती का पहली बार कुमाऊं की वैभवशाली लोकसंगीत से परिचय हुआ. रीठागाड़ी से प्रभावित होकर उप्रेती ने उत्तराखण्ड के लोकसंगीत को ही अपने जीवन का लक्ष्य चुना, आगे चलकर मोहन उप्रेती उत्तराखण्ड की पर्वतीय लोकपरम्पराओं के महान संवाहक बने और उन्होंने इसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया. हृदय की बीमारी के कारण कई अधूरे सपने दिल में लेकर उत्तराखण्ड का यह सच्चा सपूत 9 नवम्बर 1980 को इस दुनिया से चला गया. एक आदर्श कम्युनिस्ट, सच्चे देशभक्त, समाजसेवक, पत्रकार और स्वतन्त्रतास सेनानी के साथ-साथ जोशी के कई और पहलू भी थे, जिनसे दुनिया का परिचय होना शेष है.

Reference : P. C. Joshi – A Biography (Writer – Gargi Chakravartty, Publisher – National Book Trust)

Tuesday, April 27, 2010

अब बारहोंमास फलेगा "हिसालु" का फल - इन्टरनेट पर


हिसालु जेठ-असाड़(मई-जून) के महीने में पहाड़ की रूखी-सूखी धरती पर छोटी झाड़ियों में उगने वाला एक जंगली रसदार फल है. इसे कुछ स्थानों पर "हिंसर" या "हिंसरु" के नाम से भी जाना जाता है. अगर आपका बचपन पहाड़ी गांव में बीता है तो आपने हिसालू का खट्टा-मीठा स्वाद जरूर चखा होगा. शाम होते ही गांव के बच्चे हिसालू के फल इकट्ठा करने जंगलों की तरफ निकल पड़ते हैं और घर के सयाने उनके लौट आने पर इनके मीठे स्वाद का मिलकर लुत्फ़ ऊठाते हैं. हिसालू का दाना कई छोटे-छोटे नारंगी रंग के कणों का समूह जैसा होता है, वैसे नारंगी रंग के हिसालू के अलावा लाल हिसालू की भी एक प्रजाति पायी है.


हिसालू के स्वाद को उत्तराखण्ड से बाहर रह रहे उत्तराखण्ड के लोग बहुत याद करते हैं, याद करने के अलावा कुछ किया भी नहीं जा सकता क्योंकि उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों के अलावा यह फल शायद कहीं और नहीं मिलता है. इस रसभरे फल को पहाड़ से ले जाकर देश के अन्य महानगरों में रह रहे पहाड़ियों तक पहुंचाना भी संभव नहीं है क्योंकि यह फल तोड़ने के तुरन्त बाद ही खराब होने लगता है और 2-3 घन्टे बाद खाने लायक नहीं रहता.

अब हम आपको पहाड़ से लाकर हिसालु का स्वाद तो चखा नहीं सकते, लेकिन इसी हिसालु को समर्पित करते हुए हम आपके लिये लाये हैं उत्तराखण्ड की पहली Aggregator वेबसाइट- WWW.HISALU.COM. उत्तराखण्ड से सम्बन्धित सैकड़ों साइट्स अब WWW पर उपलब्ध हो चुकी हैं लेकिन क्या आप उन तक पहुंच पाये हैं? क्या आप चाहते हैं कि इन सैकड़ों वेबसाइट्स पर उपलब्ध होने वाली नई (Latest) सामग्री के बारे में आपको एक ही वेबसाइट पर पता चल जाये? तो आज ही एक नजर डालिये WWW.HISALU.COM पर.



जिस तरह हिसालू के छोटे-छोटे कण मिलकर एक हिसालू का एक तोप्पा (बूंद) बनाते हैं उसी तरह हमारा प्रयास है कि WWW.HISALU.COM के माध्यम से उत्तराखण्ड से सम्बन्धित सभी वेबसाइट्स को आपके सामने रखा जाये. हमें पूर्ण विश्वास है कि मेरा पहाड़ नेटवर्क (www.MeraPahad.com & www.ApnaUttarakhand.com) का यह प्रयास आपको अवश्य पसन्द आयेगा. कृपया हमें बतायें कि WWW.HISALU.COM को बेहतर बनाने के लिये हम और क्या कर सकते हैं? यदि आप उत्तराखण्ड से संबन्धित कोई अच्छी साइट WWW.HISALU.COM पर जुड़वाना चाहते हैं तो भी बतायें. हमें आशा है कि आप WWW.HISALU.COM को अपने अन्य उत्तराखण्डी मित्रों तक जरूर पहुंचायेंगे.



देहरादून में आयोजित इस अनावरण कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी हमारे फोरम के इस लिंक पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी वेबसाईट या ब्लाग को हिसालू डाट काम पर संकलित करवाना चाहते हैं तो निम्न पते पर ई-मेल कर अपनी साईट/ब्लाग का पता भेज सकते हैं।

hisalu@merapahad.com

Friday, April 2, 2010

उत्तराखण्ड की होली : ठेट पहाड़ी अन्दाज में

इस साल की होली मैने अपने गांव भड़कटिया, जिला पिथौरागढ (उत्तराखण्ड) में मनाई. कुमाऊंनी होली का आयोजन लगभग 1 महीने तक चलता है. लेकिन अन्तिम 5-6 दिनों में होली की उमंग पूरे शबाब पर पहुंचती है और "छलड़ी" के साथ होली का समापन होता है.

कुछ तस्वीरें


कुछ अन्य फोटो यहाँ भी देख सकते हैं.
इस लिंक पर जाकर आप कुमाऊंनी होली से संबन्धित में कई अन्य जानकारियां पा सकते हैं.